Wednesday, April 11, 2012

एक रात


[महेंद्रभटनागर]





अँधियारे जीवन - नभ में


बिजुरी-सी चमक गयीं तुम !





सावन झूला झूला जब


बाँहों में रमक गयीं तुम !





कजली बाहर गूँजी जब


श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम !





महकी गंध त्रियामा जब


पायल-सी झमक गयीं तुम !





तुलसी-चौरे पर आ कर


अलबेली छमक गयीं तुम !





सूने घर - आँगन में आ


दीपक-सी दमक गयीं तुम !





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1 comment:

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